Saturday, 30 December 2017

मदरशांना अभ्यासक्रमात संस्कृतचा समावेश हवा

नागरी सेवा परीक्षांमध्ये संस्कृत हा जास्त मार्क मिळवून देणारा विषय म्हणून ओळखला जातो.

देहरादून | Updated: December 30, 2017 3:15 PM

Madrassa: मदरशांचा प्रमुख भर हा अरबी आणि फारसी या दोन भाषांवर असतो. मात्र, भविष्यात राज्य सरकार अभ्यासक्रमात संस्कृत भाषा समाविष्ट करण्याविषयी जो निर्णय घेईल त्याचे पालन मदरशांना करावे लागेल, असे यूएमईबीच्या अधिकाऱ्यांनी सांगितले.

उत्तराखंडमधील मदरशांच्या अभ्यासक्रमात संस्कृत भाषेचा समावेश करावा, अशी मागणी येथील मदरसा वेल्फेअर सोसायटीने (एमडब्ल्यूएसयू) केली आहे. या उत्तराखंडमधील २०७ मदरसे एमडब्ल्यूएसयूच्या नियंत्रणाखाली आहेत. या मदरशांमध्ये तब्बल २५ हजार विद्यार्थी शिक्षण घेतात. या विद्यार्थ्यांना संस्कृत भाषा शिकता यावी, यासाठी एमडब्ल्यूएसयूने राज्य सरकारला अभ्यासक्रमात संस्कृत विषयाचा समावेश करण्याची विनंती केली आहे.

‘एमडब्ल्यूएसयू’चे अध्यक्ष सिबते नाबी यांनी म्हटले की, आम्ही मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत यांना पत्र पाठवून यासंबंधी विनंती केली आहे. केंद्र सरकारने काही वर्षांपूर्वी मदरशांमधील शिक्षणाचा दर्जा सुधारण्यासाठी ‘एसपीक्यूईएम’ ही योजना सुरू केली होती. जेणेकरुन मदरशांमधील विद्यार्थ्यांना विज्ञान, गणित, हिंदी, इंग्रजी, समाजशास्त्र या विषयांचे ज्ञान मिळेल. त्यामुळे या योजनेतंर्गत संस्कृत विषयाच्या शिक्षकांची भरती करण्याची परवानगी द्यावी, असे ‘एमडब्ल्यूएसयू’ने या पत्रात म्हटले आहे. या योजनेतंर्गत नोकरीवर ठेवण्यात येणाऱ्या शिक्षकांना केंद्र सरकारमार्फत वेतन दिले जाईल.

नागरी सेवा परीक्षांमध्ये संस्कृत हा जास्त मार्क मिळवून देणारा विषय म्हणून ओळखला जातो. याशिवाय, संस्कृत ही उत्तराखंडमधील अधिकृत भाषांपैकी एक आहे. त्यामुळे मदरशांमधील विद्यार्थ्यांनी संस्कृत शिकल्यास त्यांना आयुर्वेदिक आणि शल्यचिकित्सा (बीएएमएस) पदविकेच्या अभ्यासक्रमाला प्रवेश घेता येईल. त्यामुळेच आम्ही सरकारला मदरशांसाठी संस्कृत विषयाच्या शिक्षकांची भरती करण्याची विनंती केल्याचे सिबते नाबी यांनी सांगितले. याशिवाय, मदरशांमध्ये संस्कृत विषय शिकवला गेल्यास त्यामुळे समाजात सामाजिक ऐक्य आणि सलोख्याचा संदेश जाईल. ही सध्या काळाची गरज आहे. संस्कृत भाषा मुस्लिमांनी शिकू नये, असे कुठेही लिहून ठेवलेले नाही. सध्याच्या घडीला देशभरात ५००० असे मुसलमान आहेत की, ज्यांना चारही वेदांचे ज्ञान आहे व ते संस्कृत उत्तमप्रकारे बोलू शकतात.

https://www.loksatta.com/desh-videsh-news/uttarakhand-madrassa-body-wants-sanksrit-in-syllabus-1608967/

तड़प-तड़प कर मर गई कारगिल शहीद की विधवा, अस्पताल मांगता रहा आधार

तड़प-तड़प कर मर गई कारगिल शहीद की विधवा, अस्पताल मांगता रहा आधार

तड़प-तड़प कर मर गई कारगिल शहीद की विधवा, अस्पताल मांगता रहा आधार

बीमार मां को अस्पताल लेकर पहुंचा शहीद का बेटा गिड़गिड़ाता रहा, लेकिन निजी अस्पताल आधार की जिद पर अड़ा रहा।

सोनीपत (जेएनएन)। अगर आपके पास आधार कार्ड की मूल प्रति नहीं है तो हो सकता है डॉक्टर आपका इलाज ही नहीं करें। आप मोबाइल में आधार कार्ड की कॉपी रखे रहें, उसका नंबर भी सही हो लेकिन अस्पताल प्रबंधन उसे मानेगा नहीं। कम से कम यहां तो बृहस्पतिवार को यही हुआ।

एक मरीज को सिर्फ इसलिए अस्पताल प्रबंधन ने भर्ती नहीं किया, क्योंकि उसके पास आधार कार्ड की मूल प्रति नहीं थी। इलाज के अभाव में दम तोड़ देने वाली महिला कारगिल शहीद की विधवा थीं।

बीमार मां को अस्पताल लेकर पहुंचा शहीद का बेटा गिड़गिड़ाता रहा, लेकिन निजी अस्पताल का प्रबंधन आधार कार्ड जमा करवाने पर अड़ा रहा। आधार कार्ड की कॉपी मोबाइल में दिखाने के बावजूद वे नहीं माने।

महलाना गांव निवासी लक्ष्मण दास कारगिल युद्ध में शहीद हुए थे। उनकी पत्नी शकुंतला कई दिनों से बीमार थीं। बेटा पवन कई अस्पतालों में उन्हें लेकर गया था। बाद में जब शहर स्थित आर्मी कार्यालय में गया तो वहां उन्हें पैनल में शामिल शहर के निजी अस्पताल ले जाने को कहा गया।

पवन मां को लेकर अस्पताल में पहुंचे तो वहां उनसे आधार कार्ड मांगा। पवन ने मोबाइल में मौजूद आधार कार्ड का फोटो दिखाया व आधार कार्ड नंबर बताया मगर अस्पताल प्रबंधन नहीं पसीजा और पुलिस बुला ली।

पुलिस भी बेटे को ही धमकाने लगी। मां की लगातार बिगड़ती हालत देख परेशान बेटा दूसरे अस्पताल भागा लेकिन शहीद की पत्नी ने दम तोड़ दिया।

पवन का आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन ने उसकी मां का इलाज करने के बजाय उसे बाहर निकालने के लिए पुलिस बुला ली।

अस्पताल प्रबंधन भी मान रहा है कि मौके पर पुलिस बुलाई गई थी। हालांकि, उनका कहना है कि युवक को हंगामा करता देख पुलिस बुलाई गई थी।

पवन का आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने उनकी सुनने की बजाय उन्हें धमकाना शुरू कर दिया। अस्पताल में इलाज न होने पर हंगामा करते परिजन। हम इलाज करने के लिए तैयार थे लेकिन परिजन मरीज को इमरजेंसी वार्ड से बाहर ले गए।

दूसरे अस्पताल में ले जाते समय महिला की मौत हुई है। अस्पताल पर लगाए जा रहे आरोप निराधार हैं। अस्पताल के अपने कुछ नियम कानून हैं, जिन्हें हमें मानना पड़ता है।

पेपर वर्क पूरा करना पड़ता है। कोई मरीज गंभीर हालत में है तो तुरंत उसे दाखिल किया जाता है, उसका इलाज शुरू किया जाता है।

इससे पहले 28 सितंबर को आधार की वजह से भूख से एक बच्ची की मौत हो गई थी। दरअसल, झारखंड के सिमडेगा जिले में 11 साल की लड़की कथित रूप से भूख से तड़प-तड़प कर मर गई।

आरोप है कि उसका परिवार राशन कार्ड को आधार से लिंक नहीं करा पाया था, जिसके चलते पिछले आठ महीने से उन्हें सस्ता राशन नहीं मिल रहा था। परिवार का कहना है कि संतोषी कुमारी नाम की इस लड़की ने 8 दिन से खाना नहीं खाया था।

 

By JP Yadav

Publish Date:Fri, 29 Dec 2017 09:16 AM (IST) | Updated Date:Sat, 30 Dec 2017 07:29 AM (IST)

तड़प-तड़प कर मर गई कारगिल शहीद की विधवा, अस्पताल मांगता रहा आधार

तड़प-तड़प कर मर गई कारगिल शहीद की विधवा, अस्पताल मांगता रहा आधार

तड़प-तड़प कर मर गई कारगिल शहीद की विधवा, अस्पताल मांगता रहा आधार

बीमार मां को अस्पताल लेकर पहुंचा शहीद का बेटा गिड़गिड़ाता रहा, लेकिन निजी अस्पताल आधार की जिद पर अड़ा रहा।

सोनीपत (जेएनएन)। अगर आपके पास आधार कार्ड की मूल प्रति नहीं है तो हो सकता है डॉक्टर आपका इलाज ही नहीं करें। आप मोबाइल में आधार कार्ड की कॉपी रखे रहें, उसका नंबर भी सही हो लेकिन अस्पताल प्रबंधन उसे मानेगा नहीं। कम से कम यहां तो बृहस्पतिवार को यही हुआ।

एक मरीज को सिर्फ इसलिए अस्पताल प्रबंधन ने भर्ती नहीं किया, क्योंकि उसके पास आधार कार्ड की मूल प्रति नहीं थी। इलाज के अभाव में दम तोड़ देने वाली महिला कारगिल शहीद की विधवा थीं।

बीमार मां को अस्पताल लेकर पहुंचा शहीद का बेटा गिड़गिड़ाता रहा, लेकिन निजी अस्पताल का प्रबंधन आधार कार्ड जमा करवाने पर अड़ा रहा। आधार कार्ड की कॉपी मोबाइल में दिखाने के बावजूद वे नहीं माने।

महलाना गांव निवासी लक्ष्मण दास कारगिल युद्ध में शहीद हुए थे। उनकी पत्नी शकुंतला कई दिनों से बीमार थीं। बेटा पवन कई अस्पतालों में उन्हें लेकर गया था। बाद में जब शहर स्थित आर्मी कार्यालय में गया तो वहां उन्हें पैनल में शामिल शहर के निजी अस्पताल ले जाने को कहा गया।

पवन मां को लेकर अस्पताल में पहुंचे तो वहां उनसे आधार कार्ड मांगा। पवन ने मोबाइल में मौजूद आधार कार्ड का फोटो दिखाया व आधार कार्ड नंबर बताया मगर अस्पताल प्रबंधन नहीं पसीजा और पुलिस बुला ली।

पुलिस भी बेटे को ही धमकाने लगी। मां की लगातार बिगड़ती हालत देख परेशान बेटा दूसरे अस्पताल भागा लेकिन शहीद की पत्नी ने दम तोड़ दिया।

पवन का आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन ने उसकी मां का इलाज करने के बजाय उसे बाहर निकालने के लिए पुलिस बुला ली।

अस्पताल प्रबंधन भी मान रहा है कि मौके पर पुलिस बुलाई गई थी। हालांकि, उनका कहना है कि युवक को हंगामा करता देख पुलिस बुलाई गई थी।

पवन का आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने उनकी सुनने की बजाय उन्हें धमकाना शुरू कर दिया। अस्पताल में इलाज न होने पर हंगामा करते परिजन। हम इलाज करने के लिए तैयार थे लेकिन परिजन मरीज को इमरजेंसी वार्ड से बाहर ले गए।

दूसरे अस्पताल में ले जाते समय महिला की मौत हुई है। अस्पताल पर लगाए जा रहे आरोप निराधार हैं। अस्पताल के अपने कुछ नियम कानून हैं, जिन्हें हमें मानना पड़ता है।

पेपर वर्क पूरा करना पड़ता है। कोई मरीज गंभीर हालत में है तो तुरंत उसे दाखिल किया जाता है, उसका इलाज शुरू किया जाता है।

इससे पहले 28 सितंबर को आधार की वजह से भूख से एक बच्ची की मौत हो गई थी। दरअसल, झारखंड के सिमडेगा जिले में 11 साल की लड़की कथित रूप से भूख से तड़प-तड़प कर मर गई।

आरोप है कि उसका परिवार राशन कार्ड को आधार से लिंक नहीं करा पाया था, जिसके चलते पिछले आठ महीने से उन्हें सस्ता राशन नहीं मिल रहा था। परिवार का कहना है कि संतोषी कुमारी नाम की इस लड़की ने 8 दिन से खाना नहीं खाया था।

 

By JP Yadav

Publish Date:Fri, 29 Dec 2017 09:16 AM (IST) | Updated Date:Sat, 30 Dec 2017 07:29 AM (IST)

लोकमान्यांच्या सिंहगर्जनेला १०१ वर्षे पूर्ण

पुणे - लोकमान्य टिळक यांनी ‘स्वराज्य हा माझा जन्मसिद्ध हक्क आहे आणि तो मी मिळणारच’, ही सिंहगर्जना करून सामान्यांच्या मनातील ब्रिटिशांविरूद्धचा असंतोष जागा केला. या घोषणेला यंदा १०१ वर्षे पूर्ण होत आहेत. या निमित्ताने उत्तर प्रदेश सरकारने आयोजित केलेल्या विशेष कार्यक्रमात ‘सकाळ प्रकाशन’ प्रसिद्ध करीत असलेल्या अरुण तिवारी यांच्या ‘ए मॉडर्न इन्टरप्रिटेशन ऑफ लोकमान्य टिलक्‍स्‌ गीतारहस्य’ या पुस्तकाचे प्रकाशन होणार आहे.

पुणे - लोकमान्य टिळक यांनी ‘स्वराज्य हा माझा जन्मसिद्ध हक्क आहे आणि तो मी मिळणारच’, ही सिंहगर्जना करून सामान्यांच्या मनातील ब्रिटिशांविरूद्धचा असंतोष जागा केला. या घोषणेला यंदा १०१ वर्षे पूर्ण होत आहेत. या निमित्ताने उत्तर प्रदेश सरकारने आयोजित केलेल्या विशेष कार्यक्रमात ‘सकाळ प्रकाशन’ प्रसिद्ध करीत असलेल्या अरुण तिवारी यांच्या ‘ए मॉडर्न इन्टरप्रिटेशन ऑफ लोकमान्य टिलक्‍स्‌ गीतारहस्य’ या पुस्तकाचे प्रकाशन होणार आहे.

लखनौ येथील लोकभवनात शनिवारी (ता. ३०) सकाळी ११ वाजता आयोजित केलेल्या कार्यक्रमात उत्तर प्रदेशचे राज्यपाल राम नाईक हे या पुस्तकाचे प्रकाशन करतील. सांस्कृतिक संबंध वृद्धिंगत व्हावेत, या उद्देशाने उत्तर प्रदेश व महाराष्ट्र सरकारमध्ये सामंजस्य करारही होणार आहे. उत्तर प्रदेशचे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, डॉ. दिनेश शर्मा, संसदीय कार्यमंत्री सुरेश कुमार खन्ना, महिला व बाल कल्याणमंत्री रिटा बहुगुणा जोशी, युवक कल्याण राज्यमंत्री डॉ. नीलकंठ तिवारी, महाराष्ट्राचे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस या वेळी उपस्थित राहणार आहेत.

भारताच्या स्वातंत्र्यलढ्यात योगदान दिलेले मंगल पांडे, तात्या टोपे, बहादूर शाह जफर, लोकमान्य टिळक, स्वातंत्र्यवीर सावरकर, भगतसिंग, अशफाक उल्ला खान, चंद्रशेखर आझाद, ठाकूर रोशन सिंह, रामकृष्ण खत्री, शचिंद्रनाथ बक्षी, दीनदयाळ उपाध्याय, उधमसिंह, महावीर सिंह, चापेकर बंधू, विष्णू पिंगळे, एस. आर. राणा, ठाकूर दुर्गा सिंह, राघव, सरयुशरण यांच्या वंशजांनाही याप्रसंगी सन्मानित करण्यात येणार आहे. लोकमान्य टिळक यांचे पणतू शैलेश टिळक आणि त्यांच्या पत्नी, पुण्याच्या महापौर मुक्ता टिळक यांच्यासह हुतात्मा विष्णू गणेश पिंगळे यांचे वंशज रवींद्र पिंगळे, हुतात्मा शिवराम हरी राजगुरू यांचे वंशज सत्यशील आणि हर्षवर्धन राजगुरू, हुतात्मा चापेकर बंधूंचे वंशज चेतन चापेकर, स्वातंत्र्यवीर सावरकर यांचे वंशज सात्यकी यांनाही या समारंभासाठी निमंत्रित केले आहे.

लोकमान्य टिळकांनी लखनौमध्ये ‘स्वराज्य हा माझा जन्मसिद्ध हक्क आहे’, ही घोषणा केली. त्याच शहरात हा ऐतिहासिक कार्यक्रम होत आहे. शाळा, महाविद्यालयांच्या विद्यार्थ्यांनाही उत्तर प्रदेश सरकारने या कार्यक्रमासाठी सहभागी करून घेतले आहे. त्यामुळे लोकमान्यांचे कार्य जनमानसात निश्‍चितच पोचेल, असा मला विश्‍वास आहे. महाराष्ट्राबाहेर लोकमान्यांच्या कार्याचा गौरव होताय, हे कौतुकास्पद असून उत्तर प्रदेश सरकारचे मी मनापासून आभार मानते.
- मुक्ता टिळक, महापौर, पुणे महापालिका

सकाळ वृत्तसेवा 07.11 AM

http://www.esakal.com/pune/pune-news-lokmanya-tilak-book-publish-89701

युद्धाचा भडका उडाला, तर - विजय नाईक

North Korea

जगातील कोणत्याही देशांदरम्यान पारंपरिक युद्ध झाल्यास त्याचे दूरगामी परिणाम प्रत्येक देशाला कोणत्या न कोणत्या रूपात भोगावे लागतात. बहुतेक युद्धांचा परिणाम खनिज तेलांच्या किमती गगनाला भिडण्यात होतो आणि बहुतेक देशांचे कंबरडे मोडते. आपल्या देशाचे उदाहरण घेतल्यास इराक, लीबिया, आखाती देश येथील युद्धांचा फटका नोकऱ्या शोधण्यासाठी तेथे गेलेल्या लाखो भारतीयांना बसला. त्यांना मायदेशी आणण्यासाठी मोदी सरकारला शिकस्त करावी लागली.

उत्तर कोरिया व अमेरिका यांनी एकमेकांना युद्धाच्या धमक्‍या देणे सुरूच ठेवल्याने जगभरात चिंतेचे वातावरण आहे. या दोन देशांदरम्यान खरेच अणुयुद्धाला तोंड फुटल्यास काय होईल? संभाव्य युद्धासाठी दक्षिण कोरिया व अमेरिकेने काय तयारी चालविली आहे याचा ऊहापोह आंतरराष्ट्रीय पातळीवर सध्या चालू आहे.

उत्तर कोरिया व अमेरिका यांच्यात गेले काही महिने जबरदस्त शब्द व धमकीयुद्ध सुरू आहे. त्याची चर्चा सर्वत्र असून, त्याची परिणती अणुयुद्धात होणार काय, ही चिंता जगाला भेडसावू लागली आहे. उत्तर कोरियाने क्षेपणास्त्र प्रगतीमुळे अमेरिकेच्या कोणत्याही भागात अण्वस्त्र डागण्याची क्षमता प्राप्त केली आहे. उत्तर कोरियाचे अध्यक्ष किम जोंग उन यांनी अमेरिकेला युद्धाची धमकी दिली आहे, तर अमेरिकेचे अध्यक्ष डोनाल्ड ट्रम्प यांनी उत्तर कोरियाला बेचिराख करण्याचा इशारा दिला आहे. या संभाव्य युद्धाचे काय परिणाम होतील? किम जोंग उन यांना चीनचे अध्यक्ष शी जिनपिंग आवर घालू शकतील काय? युद्ध छेडल्यास त्याचे प्रशांत महासागरातील दक्षिण कोरिया, जपान, तैवान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूझीलंड, तसेच पूर्व व दक्षिण पूर्व आशियातील देशांवर कोणते गंभीर परिणाम होतील, आदी प्रश्‍नांचा आंतरराष्ट्रीय पातळीवर ऊहापोह चालू आहे. अंदाज बांधले जात आहेत. अमेरिकेत ट्रम्प सत्तेवर आल्यानंतर "डूम्स डे क्‍लॉक' (विनाशाची वेळ दर्शविणारे घड्याळ) मध्यरात्री (काळरात्र)कडे सरकण्यास केवळ अडीच मिनिटे उरली आहेत, असे दर्शविते. 1947मध्ये नोबेल पारितोषिकाच्या चौदा मानकऱ्यांनी ते तयार केले होते.

जगातील कोणत्याही देशांदरम्यान पारंपरिक युद्ध झाल्यास त्याचे दूरगामी परिणाम प्रत्येक देशाला कोणत्या न कोणत्या रूपात भोगावे लागतात. बहुतेक युद्धांचा परिणाम खनिज तेलांच्या किमती गगनाला भिडण्यात होतो आणि बहुतेक देशांचे कंबरडे मोडते. आपल्या देशाचे उदाहरण घेतल्यास इराक, लीबिया, आखाती देश येथील युद्धांचा फटका नोकऱ्या शोधण्यासाठी तेथे गेलेल्या लाखो भारतीयांना बसला. त्यांना मायदेशी आणण्यासाठी मोदी सरकारला शिकस्त करावी लागली. अजूनही त्यातून आपण पूर्णपणे बाहेर आलेलो नाही. इराकमध्ये अडकलेल्या चाळीस भारतीय कामगारांचा गेली दोन वर्षे पत्ता लागलेला नाही. सीरियातील युद्धामुळे लाखो लोकांनी जीव वाचविण्यासाठी तेथून पलायन केले. निर्वासितांच्या लोंढ्यांमुळे तुर्कस्तान व तमाम युरोप त्रस्त झाला. जर्मनीत अध्यक्ष अँजेला मर्केल यांचे पद जाताजाता वाचले. "इसिस'च्या दहशतवादाचे लोण जगातील अनेक देशांत पसरले, ते वेगळेच. भारतीय उपखंडाला युद्धाचा इतिहास असल्याने पाकिस्तान व चीनबाबत आपल्याला सतत दक्ष राहावे लागते. दुसरीकडे, अण्वस्त्रनिर्मितीला जोरदार विरोध करणारे दक्षिण कोरिया व जपान यांना किम जोंग उन याने युद्ध लादल्यास आपले काय होणार, ही चिंता सतावतेय. अण्वस्त्रनिर्मिती झटपट होत नसल्याने त्यांना अमेरिकेच्या सुरक्षाछत्राखाली राहण्याशिवाय पर्याय नाही. दुसरीकडे चोरट्या मार्गाने अण्वस्त्रे मिळविण्याचे प्रयत्न "इसिस'ने सोडलेले नाहीत.

सतरा डिसेंबर रोजी सिडनीमध्ये 59 वर्षीय चो हान छान या व्यक्तीला पोलिसांनी अटक केली. त्याच्यावर आरोप आहे, की तो उत्तर कोरियाला क्षेपणास्त्राची उपकरणे व जागतिक काळ्या बाजारात कोळसा विकण्याच्या तयारीत होता. यात इंडोनेशिया, व्हिएतनाम व काही अन्य देशांतील व्यक्ती, संघटनांचाही हात असल्याचा संशय आहे. चोई गेली तीस वर्षे ऑस्ट्रेलियात राहात असून, तो मूळचा दक्षिण कोरियाचा आहे. तो उत्तर कोरियाशी संपर्क साधून होता. सर्वसंहारक शस्त्रास्त्रांबाबत संयुक्त राष्ट्रसंघ व ऑस्ट्रेलियातील कायद्यांचे उल्लंघन केल्याने त्याला अटक झाली. त्यातून आणखी काय निष्पन्न होते, ते लवकरच प्रकाशात येईल.

उत्तर कोरिया व अमेरिका दरम्यान अणुयुद्ध झाल्यास काय होईल? दक्षिण कोरिया व अमेरिकेने काय तयारी चालविली आहे? काय अंदाज बांधले आहेत, याची माहिती दिली आहे, वॉशिंग्टनस्थित पत्रकार टोबी हार्नडेन यांनी. लंडनहून प्रसिद्ध होणाऱ्या "द संडे टाईम्स'मध्ये तीन डिसेंबर रोजी त्यांचा लेख प्रसिद्ध झाला. त्यानुसार, "पेन्टेगॉनमधील एका अधिकाऱ्याच्या मते, उत्तर व दक्षिण कोरियातील हजारो लोक मृत्युमुखी पडतील. जग अस्थिर होईल. अलीकडे उत्तर कोरियाच्या परराष्ट्र मंत्रालयाने ट्रम्प यांचे वर्णन "न्यूक्‍लियर डेमन' असे केले असून, "त्यांना अणुयुद्धाची खुमखुमी आली आहे,' असा आरोप केला आहे. दक्षिण कोरिया व अमेरिका यांचे प्रचंड युद्धसराव झाले. चीनने जोंग उन यांना लगाम घातला नाही, तर युद्धामुळे जोंग उन नेस्तनाबूत होईल. उत्तर कोरियाचे अंदाजे पन्नास लाख निर्वासित चीनमध्ये घुसतील. त्यांना आश्रय देण्याची जबाबदारी चीनवर येईल.

अमेरिकेची विमाने व क्षेपणास्त्रे प्रामुख्याने उत्तर कोरियातील क्षेपणास्त्र डागण्याची कार्यालये व क्षेपणास्त्रस्थळे (बंकर) नष्ट करतील. उत्तर कोरियाला नष्ट करण्यासाठी जोंग उन सीमेवरील लष्कराचा वापर करील. त्यामुळे ठार होणाऱ्या दक्षिण कोरियन लोकांची संख्या तीन लाखांपेक्षा कमी असेल, असे लष्करी विश्‍लेषकांचे मत आहे. दक्षिण कोरियातील सरकार पडले, तर "संयुक्त कोरिया'ची उभारणी करण्यास वॉशिंग्टन व सोल सिद्ध होतील. काही विश्‍लेषकांना वाटते की ट्रम्प यांना युद्ध आकर्षक वाटत असले, तरी कोरियन द्वीपकल्पातील गुंतागुतीचे राजकारण व परिस्थितीचे त्यांना नीटसे आकलन नाही. इराकमध्ये अमेरिकेची जी स्थिती झाली, तशी इथे होण्याची शक्‍यता टाळता येणार नाही. अमेरिकेच्या परराष्ट्र खात्यातील एका माजी ज्येष्ठ अधिकाऱ्याला वाटते, की कोणतेही पाऊल उचलण्याआधी जपान, दक्षिण कोरिया, तैवान, ऑस्ट्रेलिया या मित्रराष्ट्रांवर काय संकटे कोसळतील, याचा विचार ट्रम्प यांनी केला पाहिजे. कारण, दुसऱ्या महायुद्धात संहार झाला, त्यापेक्षाही अधिक संहार विद्यमान पिढीला अनुभवण्याचे अरिष्ट कोसळेल.

या चर्चेच्या मधेच, पाकिस्तानचे राष्ट्रीय सुरक्षा सल्लागार लेफ्टनंट जनरल नासेर खान जानजुवा यांनी गेल्या आठवड्यात भारताविरुद्ध अण्वस्त्रयुद्धाचा इशारा द्यावा, हा योगायोग समजायचा काय, की चीनशी हातमिळवणी करीत दक्षिण आशियाला अस्थिर करण्याचा पाकिस्तान व चीनचा संयुक्त डाव समजायचा? ""चीनच्या साह्याने पाकिस्तानमध्ये सुरू असलेल्या "सीपेक कॉरिडॉर' प्रकल्प हाणून पाडण्यासाठी भारत व अमेरिका यांनी हातमिळवणी केली आहे,'' असा आरोप त्यांनी केला आहे. त्यात अर्थातच तथ्य नाही.

विजय नाईक  : 08.06 AM

 

http://www.esakal.com/saptarang/vijay-naik-writes-about-north-korea-and-war-89705